किंतूर (बदोसराय), बाराबंकी | RPTV BHARAT
शबे ज़रबत-ए-मौला हज़रत अली अलैहिस्सलाम के मौके पर किंतूर (बदोसराय) में अकीदत व एहतराम के साथ ताबूत-ए-मौला अली उठाया गया। “या अली, या हुसैन” की मातमी सदाओं के बीच अज़ादारों ने ग़म का इज़हार किया और बड़ी तादाद में लोगों ने शिरकत की।
इस अवसर पर कुमैल किंतूरी ने बताया कि यह ताबूत बहुत क़दीमी है और सैकड़ो वर्षों उठाया जाता है। उन्होंने कहा कि तारीख़ी एतेबार से मुसलमानों के चौथे खलीफ़ा और अहले तशय्यो के पहले इमाम हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत की याद में हर साल यह कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। यह ताबूत शिया जामा मस्जिद से उठ कर अली मिया साहेब के घर के क़दीमी इमाम बाड़े में रखा जाता है।
उन्होंने बताया कि 19 रमज़ान को जब इमाम अली अलैहिस्सलाम मस्जिद में नमाज़-ए-फ़ज्र अदा कर रहे थे, उसी दौरान इब्ने मुल्जिम ने तलवार से वार कर उन्हें ज़ख्मी कर दिया था। इसके बाद उनके बेटे इमाम हसन अलैहिस्सलाम और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम वा उनके नज़दीकी सहाबी उन्हें घर ले आए, जहां 21 रमज़ान को उनकी शहादत हुई।
ख़िताब करते हुए मौलाना मज़ाहिर हुसैन ने इमाम अली अलैहिस्सलाम के जीवन, न्याय और इंसाफ़ की शिक्षाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इमाम अली का जीवन मानवता, न्याय और सच्चाई की मिसाल है। उन्होंने आगे बताया कि इमाम अली अलैहिस्सलाम पर हुआ हमला इंसानियत पर हमला था। उन्होंने कहा कि इबादतगाहों में हिंसा करने वाले लोग उसी सोच के वारिस हैं, जिसकी शुरुआत इब्ने मुल्जिम जैसे लोगों से हुई थी। मौलाना ने मुल्क में अमन, भाईचारे और एकता के लिए खास दुआ कराई।
इस मौके पर अंजुमन ज़ुल्फिकार-ए-हैदरी के साहिबे-बयाज़ मीसम अब्बास ने दर्दभरा नौहा पढ़ा:
“तुम्हारे बाद हुए हैं बहुत सितम हम पर,
किसी ने आ के न पूछा अली अली मौला।
कहेंगे तुझसे ऐ मीसम मलक ये महशर में,
सुना दो फिर वही नौहा अली अली मौला।”
नौहा सुनकर अज़ादारों की आंखें नम हो गईं और पूरे माहौल में ग़म व अकीदत की फिज़ा छा गई।
इस अवसर पर इलाके के बड़ी संख्या में अज़ादार मौजूद रहे और ताबूत व मजलिस में शामिल होकर हज़रत अली अलैहिस्सलाम को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश की।
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