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मज़हब के नाम पर सियासत, एक तल्ख़ हक़ीक़त



“मुनाफ़िक़ों का ताल्लुक़ वही है दीन के साथ,
कि जैसा साँप का होता है आस्तीन के साथ।” 
सलीम सिद्दीकी साहेब का यह शेर जब भी कानों में पड़ता है, तो कई चेहरे अपने आप बेनक़ाब नज़र आने लगते हैं। कुछ चेहरे धुँधले, कुछ स्याह — और कुछ इतने स्याह कि पहचान छुपाए नहीं छुपती। बात किसी एक शख़्स की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो दीन का लिबास ओढ़कर सियासत की बाज़ी खेलती है।
मज़हब के नाम पर बना एक मुल्क
14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान दुनिया के नक्शे पर उभरा। दावा यह था कि यह इस्लाम के नाम पर बना एक ऐसा राज्य होगा जो इंसाफ़, बराबरी और भाईचारे की मिसाल पेश करेगा। मगर सवाल यह है कि क्या मज़हब का नाम लेना ही काफ़ी है?
मुल्क नारों से नहीं, नीयत और अमल से चलते हैं। अगर मज़हब को सिर्फ़ पहचान की राजनीति का औज़ार बना दिया जाए, तो वह रूहानी ताक़त नहीं रहता—सिर्फ़ एक सियासी ढाल बन जाता है।
“इस्लाम के नाम पर” — लेकिन रास्ता कौन सा?
इस्लाम अमन, अद्ल और इल्म की बात करता है। लेकिन अगर किसी देश की सियासत का केंद्र यह बन जाए कि “कौन पड़ोसी का ज़्यादा बुरा चाहता है”, तो यह सोच खुद अपने भविष्य को गिरवी रख देती है।
सच यह है कि दशकों से वहाँ की राजनीति में अस्थिरता, सत्ता संघर्ष और फौजी दख़ल ने लोकतांत्रिक ढांचे को कमज़ोर किया। नतीजा यह हुआ कि असली मुद्दे—शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिरता—पिछली पंक्ति में चले गए और आगे आया भावनात्मक राष्ट्रवाद।
आतंकवाद की छाया और वैश्विक छवि
दुनिया में किसी भी देश की साख उसके बयानों से नहीं, उसके व्यवहार से बनती है। जब किसी राष्ट्र पर बार-बार यह आरोप लगे कि उसकी ज़मीन से चरमपंथी नेटवर्क पनपते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
आलोचना का मतलब यह नहीं कि वहाँ की अवाम पर उंगली उठाई जाए—आम लोग हर देश में अमन चाहते हैं। मगर राज्य की नीतियों और सत्ता की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाना ज़रूरी है। अगर कट्टरपंथ के खिलाफ निर्णायक और पारदर्शी कदम न उठाए जाएँ, तो शक की दीवारें और ऊँची होती जाती हैं।
यह भी उतना ही सच है कि अंध-राष्ट्रवाद और भावनात्मक उन्माद किसी एक देश की जागीर नहीं। जब समाज सवाल पूछना छोड़ देता है और सिर्फ़ नारे दोहराने लगता है, तो लोकतंत्र खोखला हो जाता है।
अगर सच्चाई लिखी जाए तो सरकारी कट्टर समर्थकों को बुरा लग सकता है—क्योंकि सच सुनना आसान नहीं होता। मगर इतिहास गवाह है कि जो समाज आत्ममंथन से भागता है, वह ठहराव का शिकार हो जाता है।
जब बार-बार अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों, घटनाओं और सुरक्षा चिंताओं में एक ही देश का नाम उभरे, तो वैश्विक धारणा कठोर हो जाती है। ऐसी छवि से बाहर निकलने का रास्ता सिर्फ़ एक है—स्पष्ट नीति, सख़्त कार्रवाई और शांति की सच्ची प्रतिबद्धता।
दुनिया को भाषण नहीं, बदलाव दिखाई देना चाहिए।
दीन ढाल नहीं, दर्पण बने
शायर का शेर एक चेतावनी है—दीन को आस्तीन में छुपे ज़हर की तरह इस्तेमाल मत कीजिए। मज़हब अगर इंसानियत से दूर कर दे, तो वह अपनी असली पहचान खो देता है।
मुल्कों की असली ताक़त हथियारों से नहीं, संस्थानों की मजबूती, कानून की बराबरी और नागरिकों की खुशहाली से मापी जाती है। अगर नीतियाँ नफ़रत पर आधारित होंगी तो परिणाम भी विभाजनकारी होंगे।
आज ज़रूरत है कि दक्षिण एशिया नारे नहीं, नीयत बदले। कट्टरता नहीं, सहयोग चुने। क्योंकि इतिहास यह सिखाता है! "जो राष्ट्र आत्ममंथन से नहीं डरते, वही टिकाऊ तरक़्क़ी की राह पर आगे बढ़ते हैं।"
 (ये लेखक के अपने विचार है लेखक एक समाजसेवी एवं स्वतंत्र लेखक हैं। ✒️ डॉक्टर रेहान काज़मी)

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